*कृषि मंत्रालय के राउंडटेबल में विज्ञान-आधारित सुधार और बायोटेक फसलों के लिए तेज स्वीकृति प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर*

*कृषि मंत्रालय के राउंडटेबल में विज्ञान-आधारित सुधार और बायोटेक फसलों के लिए तेज स्वीकृति प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर*
AMISHA SHARMA/JOURNALIST/DAILY INDIATIMES DIGITAL JOURNALISM PLATFORM/28 JULY 2026

*नई दिल्ली, 28 जुलाई:* ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) द्वारा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के सहयोग से आयोजित एक उच्च स्तरीय राउंडटेबल में भारत में जैव-प्रौद्योगिकी आधारित फसलों को सुरक्षित रूप से अपनाने में गति के लिए विज्ञान-आधारित नियामकीय सुधारों और स्वीकृति प्रक्रिया को तेज करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार, बैठक में शामिल प्रतिभागियों के बीच इस बात पर व्यापक सहमति बनी कि भारत की जैव-प्रौद्योगिकी नियामक व्यवस्था को उच्च जैव-सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए अधिक प्रभावी, पारदर्शी और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जाना चाहिए।
राउंडटेबल में कहा गया कि "जैव-प्रौद्योगिकी, विशेषकर जीनोम संपादन (Genome Editing), में हो रही प्रगति के अनुरूप नियामकीय ढांचे को विकसित करने के साथ ही, जैव-सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के सर्वोच्च मानकों को भी बनाए रखना आवश्यक है।"
इस दौरान यह भी कहा गया कि नियामक व्यवस्था विज्ञान पर आधारित, पारदर्शी, प्रभावी और जोखिम के अनुरूप होनी चाहिए। साथ ही, मंजूरी की प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध बनाया जाए, ताकि सरकारी और निजी - दोनों क्षेत्रों के इनोवेटर्स के लिए इसे आसानी से उपलब्ध कराया जा सके।

इस राउंडटेबल के सहभागीदारों ने इस बात पर भी जोर दिया कि "सुरक्षित जैव-प्रौद्योगिकी फसलों को समय पर अपनाना जलवायु अनुकूलन क्षमता, उत्पादकता, पोषण सुरक्षा, किसानों की आय तथा भारतीय कृषि की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।"
मंत्रालय ने बताया कि भारत में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत ट्रांसजेनिक फसलों के लिए पहले से ही बहु-स्तरीय नियामकीय व्यवस्था लागू है। इसमें जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की रिव्यू कमेटी ऑन जेनेटिक मैनिपुलेशन (RCGM), जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमेटी (GEAC), भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI), ICAR तथा अन्य संबंधित मंत्रालय शामिल हैं।
साथ ही, मंत्रालय ने यह भी कहा कि CRISPR जैसी जीनोम-संपादन तकनीकों में तीव्र प्रगति, वैश्विक नियामकीय व्यवस्थाओं में बदलाव और क्लाइमेट-रेजिलिएंट खेती की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए मौजूदा नियामकीय व्यवस्था की समीक्षा और आधुनिकीकरण आवश्यक है।
इस विषय में, ICAR के महानिदेशक एवं DARE के सचिव डॉ. एम. जे. सती ने कहा कि "हमें एक ऐसी संतुलित नियामकीय व्यवस्था की आवश्यकता है जो खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन क्षमता और सतत कृषि विकास के लिए आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकियों के सुरक्षित उपयोग को सक्षम बनाए।"
वहीं, TAAS के अध्यक्ष डॉ. आर. एस. परोड़ा ने कहा कि भारत के पास कृषि जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व करने की वैज्ञानिक क्षमता है। उन्होंने कहा कि इस राउंडटेबल की सिफारिशें ऐसे सक्षम नीतिगत माहौल के निर्माण में अत्यंत सहायक होगी, जो मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए जिम्मेदार नवाचार को बढ़ावा दे।इस राउंडटेबल की सिफारिशों को एक नीति दस्तावेज के रूप में संकलित किया जाएगा, जिसे संबंधित मंत्रालयों और नियामकीय प्राधिकरणों को प्रस्तुत किया जाएगा ताकि भारत में बायोटेक फसल पौधों के नियमन और मंजूरी प्रक्रिया में साक्ष्य-आधारित सुधारों को समर्थन मिल सके।