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राजस्थान निकाय चुनाव : बीजेपी में थोड़ी जीत से हताशा और कॉंग्रेस थोड़ी हार से जश्न मना रही, JOURNALIST VISHNU AGRAWAL की रिपोर्ट

कांग्रेस अभी भी लगभग बराबर वोट शेर के साथ मुकाबले में है और निर्दलीय तीसरी ताकत के रूप में उभरे हैं। इसलिए इन नतीजों को बीजेपी के लिए जीत के साथ चेतावनी और कांग्रेस के लिए हार के बावजूद उम्मीद के तौर पर पड़ा जा सकता है। अब 2028 के पहले असली सवाल यही है। क्या बीजेपी अपने कमजोर इलाकों में पकड़ मजबूत कर पाएगी? और क्या कांग्रेस अपने 34% वोट शेयर को सीटों में बदलने की रणनीति तैयार कर पाएगी?

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By Editorial Desk

Published: Sep 16, 2026 01:02 PM • Updated: Oct 31, 2026 • 137,116 views

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राजस्थान निकाय चुनाव : बीजेपी में थोड़ी जीत से हताशा और कॉंग्रेस थोड़ी हार से जश्न मना रही, JOURNALIST VISHNU AGRAWAL की रिपोर्ट 137,116 views

JOURNALIST VISHNU AGARWAL की खास रिपोर्ट

VISHNU AGRAWAL/NEWS EDITOR/DAILY INDIATIMES DIGITAL JOURNALISM PLATFORM

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राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी है। लेकिन नतीजों को करीब से देखें तो यह जीत उस तरह की एक तरफा जीत नहीं है जैसी बीजेपी ने महाराष्ट्र और गुजरात के शहरी निकाय चुनावों में दिखाई थी। राजस्थान में बीजेपी ने 4179 वार्ड जीते। जबकि कांग्रेस 3613 वार्डों के साथ दूसरे नंबर पर रही। सबसे चौंकाने वाली तस्वीर निर्दलीयों की रही जिन्होंने 2273 वार्ड जीतकर पूरे चुनावी गणित को बदल दिया।

वोट शेयर भी बीजेपी के लिए बहुत बड़ी बढ़त की कहानी नहीं कहता। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी को 35.18% कांग्रेस को 34.24% वोट मिले हैं। दोनों दलों के बीच अंतर सिर्फ 0.94% रहा। यह आंकड़ा बताता है कि शहरी राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला अभी भी बेहद करीबी है। सीटों में बीजेपी आगे जरूर निकल गई, लेकिन वोटों के स्तर पर कांग्रेस उससे बहुत पीछे नहीं रही। वोट शेयर में मामूली अंतर। अगर सिर्फ सीटों को देखें तो बीजेपी की बढ़त बड़ी दिखाई देती है। लेकिन वोट शेयर का अंतर कहानी बदल देता है। बीजेपी के पास 4179 वार्ड हैं। कांग्रेस के पास 3613 और निर्दलीयों के पास 2273 यानी बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीटों का अंतर करीब 566 वार्ड है। लेकिन वोट शेयर में अंतर 1% से भी कम है। यही वजह है कि इन नतीजों को बीजेपी की बड़ी जीत तो कहा जा सकता है लेकिन प्रचंड जीत कहना मुश्किल होगा। खासकर तब जब पार्टी महाराष्ट्र और गुजरात में कहीं ज्यादा मजबूत शहरी प्रदर्शन कर चुकी है। निर्दलीयों ने बिगाड़ा पूरा गणित। राजस्थान के इन चुनावों का सबसे बड़ा संदेश शायद निर्दलीयों का उभार है। 2273 वार्ड जीतना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं। कई नगर निकायों में निर्दलीय अब वोट बनाने और बहुमत तय करने की स्थिति में है। भरतपुर इसका सबसे बड़ा एग्जांपल भी है। भरतपुर में 65 में से 36 वार्ड निर्दलीयों ने जीत लिए। बीजेपी को 20 और कांग्रेस को सिर्फ 60 वार्ड मिले। यानी मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के गृह जिले में दोनों प्रमुख दलों से आगे निर्दलीय निकल गए। हनुमानगढ़ में निर्दलीयों ने 60 में से 32 वार्ड जीतकर बहुमत का आंकड़ा पार किया। पाली, अजमेर, अलवर, जोधपुर, दौसा, डिडवाना, पोखरण, खाटूशामजी और सालुमभर में निकायों में निर्दलीयों की संख्या वोट गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। बड़े नेताओं के गढ़ में मिली चुनौती। इन नतीजों में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि पार्टी का प्रभाव हर जिले में एक जैसा नहीं रहा। भरतपुर में निर्दलीयों का दबदबा इसका उदाहरण है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गण झालावाड़ में कांग्रेस ने 45 में से 29 वार्ड जीतकर मजबूत प्रदर्शन किया। यानी स्थानीय चुनावों में बड़े नेताओं का प्रभाव होने के बावजूद स्थानीय उम्मीदवार व्यक्तिगत समीकरण और बागियों का असर काफी दिखाई दिया। बीजेपी की जीत लेकिन कांग्रेस पूरी तरह खत्म नहीं। कांग्रेस के लिए यह नतीजे निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण है। लेकिन पार्टी को पूरी तरह खारिज करना भी जल्दबाजी होगी। 34.24% वोट के साथ कांग्रेस ने लगभग बीजेपी के बराबर वोट हासिल किए। बीकानेर में कांग्रेस ने नगर निगम में बहुमत हासिल किया। जबकि कई दूसरे शहरों में वह बीजेपी को सीधी चुनौती देने में कामयाब भी रही। यही वह आंकड़ा है जो कांग्रेस के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी वजह बन सकता है। पार्टी के पास वोट आधार मौजूद है लेकिन उसे सीटों में बदलने के लिए संगठन और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करना होगा। छोटी पार्टियों ने भी खोली नहीं रहा। इस चुनाव में सिर्फ बीजेपी, कांग्रेस और निर्दलीयों की कहानी नहीं है। आम आदमी पार्टी ने 12 नगर परिषद में 60 में से 31 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। सीपीआईएम ने बीकानेर में नौखा में 45 में से 29 वार्ड जीतकर वोट बनाने की स्थिति हासिल की। इससे संकेत मिलता है कि कुछ इलाकों में मतदाता बीजेपी कांग्रेस के पार भी विकल्प तलाश हो रहे हैं। राज्य स्तर पर आपने 42 आरएलपी ने 63 और सीपीआईएम ने 30 से ज्यादा वार्ड जीते। यानी छोटे दलों का प्रभाव भले ही पूरे राजस्थान में बड़ा ना हो लेकिन स्थानीय स्तर पर उन्होंने चुनावी समीकरण जरूर बदले। परिसीमन ने बदला चुनावी गणित। इस बार वार्डों की संख्या बढ़ने की वजह से पुराने चुनाव से सीधे तुलना करना भी आसान नहीं है। परिसीमन के बाद नए वार्ड बने हैं और कई इलाकों की भौगोलिक तथा मतदाता संरचना बदली है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने भी चुनावी नुकसान के संदर्भ में परिसीमन पर सवाल उठाए। हालांकि उनके आरोपों को राजनीतिक दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। हालांकि ईवीएम संबंधी तकनीकी दिक्कतों की वजह से जयपुर, जोधपुर और कोटा के मेट चुनाव की प्रक्रिया में बदलाव किया गया है। प्रभावित बूथों पर दोबारा मतदान और उसके बाद मतगणना होगी। इसलिए इन निगमों का अंतिम राजनीतिक गणित बाद में साफ हो पाएगा। इन नतीजों को 2028 विधानसभा चुनाव का सीधा ट्रेलर मानना जल्दबाजी होगी क्योंकि नगर निकाय चुनावों में स्थानीय उम्मीदवार और स्थानीय मुद्दे ज्यादा प्रभाव डालते हैं। लेकिन इतना जरूर है कि बीजेपी को यह संदेश मिला है कि सत्ता में होने के बावजूद हर शहरी इलाके में उसका दबदबा एक जैसा बिल्कुल भी नहीं है। नतीजे बीजेपी के लिए सिर्फ जीत का जश्न मनाने के बजाय आत्म मंथन का संकेत है। खासकर तब जब वोट शेयर में बीजेपी और कांग्रेस के बीच 1% से भी कम अंतर हो और हजारों वार्डों में निर्दलीय निर्णायक भूमिका में हो। बकायदा उन्होंने एक पोस्ट के जरिए बताया कि ऐसे चुनाव परिणाम कम देखने को मिलते हैं जिससे जीतने वाली पार्टी जीतकर भी डरी हो और हारने वाली पार्टी हारकर भी गदगद हो। राजस्थान निकाय चुनाव में यही हुआ है। बीजेपी के कान के पास से गोली गुजर गई। मतलब बीजेपी बाल-बाल बची है। बीजेपी की जीत में भी बीजेपी की हार छिपी है। राजस्थान के 10 नगर निगमों में से बीजेपी के चार नगर निगमों जयपुर, कोटा, उदयपुर और भीलवाड़ा में पूर्ण बहुमत मिलने से बड़ी खबर पांच निगमों अजमेर, जोधपुर, भरतपुर, अलवर और पाली में बीजेपी का बहुमत से दूर रहना है। यहां निर्दलीय किंग मेकर बनकर उभरे हैं। मतलब निर्दलीय मेयर बनाएंगे। कांग्रेस सिर्फ बीकानेर में जीती है। जयपुर जिला तो बीजेपी का गढ़ रहा है। पूरे जयपुर जिले में कांग्रेस को 676 815 वोट मिले हैं। जबकि भाजपा के खाते में 675929 वोट पड़े हैं। यानी कांग्रेस को 886 वोट ज्यादा मिले हैं। कुल मिलाकर राजस्थान में बीजेपी जीती है। लेकिन जीत का स्वरूप महाराष्ट्र या गुजरात जैसी आंधी वाला नहीं है। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है। कांग्रेस अभी भी लगभग बराबर वोट शेर के साथ मुकाबले में है और निर्दलीय तीसरी ताकत के रूप में उभरे हैं। इसलिए इन नतीजों को बीजेपी के लिए जीत के साथ चेतावनी और कांग्रेस के लिए हार के बावजूद उम्मीद के तौर पर पड़ा जा सकता है।

अब 2028 के पहले असली सवाल यही है। क्या बीजेपी अपने कमजोर इलाकों में पकड़ मजबूत कर पाएगी? और क्या कांग्रेस अपने 34% वोट शेयर को सीटों में बदलने की रणनीति तैयार कर पाएगी?

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