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Maharashtra News: कोकण में ST बसों की बदहाली और उपेक्षा के चलते यात्रियों को भारी मुश्किल, कटघरे में शासन

कात्रज चौक की यह घटना महज एक हादसा नहीं, बल्कि पूरे राज्य की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के लिए चेतावनी है। सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि यात्री का बुनियादी अधिकार है। अगर प्रशासन अब भी अनदेखी करता रहा तो अगली बार नुकसान सिर्फ कुछ वाहनों का नहीं, बल्कि कई परिवारों का हो सकता है।*

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By Editorial Desk

Published: Aug 14, 2026 12:19 PM • Updated: Oct 07, 2026 • 104 views

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Maharashtra News: कोकण में ST बसों की बदहाली और उपेक्षा के चलते यात्रियों को भारी मुश्किल, कटघरे में शासन 104 views

Maharashtra News: कोकण में ST बसों की बदहाली और उपेक्षा के चलते मुश्किल में यात्री, कटघरे में शासन, देखिए खास रिपोर्ट

A.S. BHOLA (JOURNALIST)/DINESH YASHWANT/ MAHARASHTRA NEWS/DAILY INDIATIMES

महाराष्ट्र के कोकण क्षेत्र की ओर जाने वाले लाखों यात्री एक बार फिर गणेशोत्सव के मौसम में महाराष्ट्र राज्य मार्ग परिवहन महामंडल (एमएसआरटीसी) की बसों की बदहाली का सामना करने को मजबूर हैं। मुंबई से कोकण की 14-15 घंटे लंबी यात्रा में गंदी सीटें, खराब खिड़कियां, अस्पष्ट नामफलक और पान-गुटखा की थूक जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। लोकमत के पाठक महादेव गोळवसकर ने हाल ही में इस ओर ध्यान दिलाते हुए प्रशासन की उपेक्षा पर सवाल उठाए हैं। यह शिकायत अकेली नहीं है। राज्य की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की पुरानी खामियां एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं।

समस्या कितनी गहरी है ?

कोकण मार्ग पर चलने वाली एसटी बसें यात्रियों को उनके गंतव्य तक तो पहुंचा देती हैं, लेकिन यात्रा का अनुभव बेहद कष्टदायक बना देती हैं। आरक्षित सीट पर बैठते ही यात्री को लगता है कि बस की सफाई नहीं हुई। खिड़कियों के कांच न खुलते हैं, न बंद होते। नामफलक इतने धुंधले हैं कि बस का रूट समझना मुश्किल हो जाता है। ज्येष्ठ नागरिक सरकारी बस को सुरक्षित मानकर यात्रा करते हैं, लेकिन बार-बार की असुविधा उन्हें निजी विकल्पों की ओर धकेल रही है। गणेशोत्सव के दौरान मुंबई, पुणे और अन्य शहरों से पांच लाख से अधिक यात्री कोकण पहुंचते हैं। इस अवधि में हर बस डिपो में करोड़ों का लेनदेन होता है, फिर भी बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी जारी है।

सरकार और महामंडल के कदम

एमएसआरटीसी ने इस वर्ष गणेशोत्सव (7 से 25 सितंबर) के लिए कोकण मार्ग पर 5,220 अतिरिक्त बसें चलाने का ऐलान किया है। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के निर्देश पर बस स्टेशनों और बसों की नियमित सफाई का अभियान भी चलाया जा रहा है। अप्रैल से टिकट पर दो रुपये का स्वच्छता अधिभार लगाया गया है, जिससे स्टेशनों और बसों की सफाई के लिए निजी एजेंसियां लगाई गई हैं। मंत्री खुद कई डिपो का निरीक्षण कर सुधार के आदेश दे चुके हैं। पुराने फ्लीट को बदलने और इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ाने के प्रयास भी चल रहे हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। बरसात में छत से पानी रिसना, खराब हेडलाइट्स और टूटी खिड़कियों की शिकायतें अब भी आ रही हैं। अधिभार वसूलने के बावजूद कई जगहों पर स्वच्छता का स्तर अपेक्षा के अनुरूप नहीं है।

क्या किया जाना चाहिए?

विशेषज्ञों और यात्री संगठनों का मानना है कि केवल अतिरिक्त बसें चलाना काफी नहीं है। यात्रा की गुणवत्ता सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले हर बस के प्रस्थान से पहले अनिवार्य सफाई और मरम्मत की चेकलिस्ट लागू की जानी चाहिए। खिड़कियां, सीटें और नामफलक की नियमित जांच हो। यात्री फीडबैक सिस्टम को मजबूत बनाया जाए, ताकि शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो। पुराने फ्लीट को तेजी से बदला जाए और रखरखाव बजट का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाए। गणेशोत्सव जैसे पीक सीजन में विशेष निगरानी दल तैनात किए जाएं, जो मार्ग पर बसों की हालत जांचें। उपहारगृहों और शौचालयों की स्वच्छता पर भी सख्त निगरानी जरूरी है।

एसटी महाराष्ट्र की जनता की जीवन रेखा है। लाखों रुपये का राजस्व कमाने के बावजूद यात्रियों को असुविधा झेलनी पड़े, यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है। प्रशासन को अब गंभीरता से सोचना होगा कि यात्री क्यों निजी बसों की ओर रुख कर रहे हैं। बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि यात्री का अधिकार है। अगर समय रहते सुधार नहीं हुए तो सरकारी परिवहन व्यवस्था की विश्वसनीयता और गिर सकती है।

महाराष्ट्र की सार्वजनिक बसों में बार-बार ब्रेक फेल: व्यवस्था की बड़ी खामी उजागर

राज्य में एसटी और पीएमपीएमएल जैसी सार्वजनिक बस सेवाओं में रखरखाव की उपेक्षा अब आम शिकायत बन चुकी है। कोकण मार्ग की लंबी दूरी वाली बसों में गंदगी, खराब खिड़कियां और टूटे नामफलक की समस्याएं पहले से चर्चा में हैं। वहीं शहरों में ब्रेक फेल, बार-बार ब्रेकडाउन और तकनीकी खराबी की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। ठेकेदारों द्वारा संचालित बसों में ये समस्याएं और ज्यादा हैं। जून में सिर्फ दो दिनों की बारिश में सैकड़ों बसें खराब हो गई थीं। यात्री रोज एसी न चलने, बीच रास्ते में बस रुक जाने और सुरक्षा उपकरणों की लापरवाही की शिकायत करते हैं।

_इसी खामी का ताजा उदाहरण पुणे के कात्रज चौक पर गुरुवार शाम देखने को मिला। पीएमपीएमएल की एक बस का ब्रेक अचानक फेल हो गया। नियंत्रण से बाहर हुई बस ने कई वाहनों को नुकसान पहुंचाया, दो लोग मामूली रूप से घायल हुए और पीक आवर्स में भारी जाम लग गया। जान तो बच गई, लेकिन यह घटना महज एक स्थानीय हादसा नहीं, बल्कि पूरे राज्य की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की गहरी खामी को फिर से उजागर करती है।_

अगर यही स्थिति बनी रही तो नुकसान क्या होगा?

भविष्य की तस्वीर चिंताजनक है। अगर रखरखाव की यही लापरवाही जारी रही तो जानमाल का नुकसान बढ़ेगा। व्यस्त चौराहों और ढलान वाले रास्तों पर ब्रेक फेल होने से बड़े हादसे हो सकते हैं।

लोगों का सार्वजनिक परिवहन पर से भरोसा और टूटेगा। यात्री निजी वाहनों की ओर भागेंगे, जिससे सड़कों पर भीड़, जाम और प्रदूषण बढ़ेगा। हर हादसे के साथ घंटों ट्रैफिक ठप होना आम हो जाएगा। आर्थिक नुकसान भी भारी पड़ेगा—वाहनों की क्षति, मुआवजे, स्वास्थ्य खर्च और समय का नुकसान सब मिलकर करोड़ों का बोझ डालेंगे।

*सबसे* खतरनाक बात यह है कि यह समस्या सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं रहेगी। पूरे राज्य की सार्वजनिक बस सेवा अगर इसी तरह उपेक्षित रही तो यह एक बड़े संकट का रूप ले सकती है।

इस खामी को कैसे दूर किया जा सकता है?

समाधान संभव है, लेकिन इच्छाशक्ति की जरूरत है। हर बस के प्रस्थान से पहले ब्रेक, टायर और सुरक्षा उपकरणों की अनिवार्य जांच हो। बिना ‘फिट’ प्रमाणपत्र के बस सड़क पर न उतरे। ठेकेदारों पर सख्त निगरानी रखी जाए और बार-बार खराबी आने पर ठेका रद्द करने तक की कार्रवाई हो। बसों में आधुनिक सेंसर लगाए जाएं जो तकनीकी खामियों की पहले ही चेतावनी दें। ड्राइवरों को आपात स्थिति से निपटने का नियमित प्रशिक्षण दिया जाए। हर हादसे की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए ताकि जवाबदेही तय हो।

*कात्रज चौक की यह घटना महज एक हादसा नहीं, बल्कि पूरे राज्य की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के लिए चेतावनी है। सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि यात्री का बुनियादी अधिकार है। अगर प्रशासन अब भी अनदेखी करता रहा तो अगली बार नुकसान सिर्फ कुछ वाहनों का नहीं, बल्कि कई परिवारों का हो सकता है।*

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