

DAILY INDIATIMES/धर्म/23 जुलाई 2025 बुधवार
सावन महीना Special :Shivji aur Apsara Ki Kahani : भगवान शिव की लीला, अप्सरा को देखने के लिए हुए पंचमुख, प्रकट हुआ तीसरा नेत्र
भगवान शिव जिन्हें आदियोगी और सृष्टि के संग्राहक हैं। भगवान शिव के प्रकोप से असुर ही नहीं बल्कि देवता भी डरते हैं। हमेशा ध्यान में विलीन रहने वाले भगवान शिव को एक बार पंचमुखी होना पड़ा था और वो भी एक अप्सरा तिलोत्तमा के कारण। यह भी भगवान शिव की एक अद्भूत लीला थी। आइए जानते हैं भगवान शिव और अप्सरा तिलोत्तमा की कथा।

भगवान शिव की आरती करते हुए आपने कई बार शिवजी को पंचानन कहा होगा यानी जिनके पांच मुख है। शिवजी का पांच मुख के साथ प्रकट होना शिवलीला का एक भाग है जिसमें शिवजी ने अपनी योग शक्ति और दिव्य माया को प्रकट किया है। और इसकी भी एक रोचक कथा है। शिवजी के पंचमुख होने की कथा का जिक्र महाभारात के अनुशासन पर्व में बताया गया है इसके अलावा भी कई स्थानों पर पंचमुख शिव का वर्णन मिलता है। और इस कथा में एक अप्सरा का नाम भी आता है जिनकी सुंदरता ने जग को मोहित कर लिया था। ब्रह्माजी ने भगवान शिव की प्रेरणा से ही सृष्टि की सबसे उत्तम और सुंदरतम वस्तुओं को लेकर एक स्त्री का निर्माण किया और उसे नाम मिला तिलोत्तमा अप्सरा। और इसी अप्सरा के कारण भगवान शिव को अपनी लीला में पंचमुख रूप धारण करना पड़ा।

शिवलीला और तिलोत्तम का जन्म
सुंद और उपसुंद नामक दो असुर थे जिनके पराक्रम से सृष्टि में भय का माहौल बन गया था। देवगण भयभीत होकर भटक रहे थे। ऐसे में शिवजी की प्रेरणा से ब्रह्माजी ने असुरों के नाश के लिए एक दिव्य सुंदरी अप्सरा का निर्माण किया। उन्होंने इसके लिए संसार सृष्टि में जो भी सबसे सुंदर वस्तु थी उन सभी को एकत्रित किया और फिर उससे तिल-तिल सुंदरतम सौदर्य प्रतिमा का निर्माण किया और वह सौदर्य की मूर्ति बनकर प्रकट हुए अप्सरा तिलोत्तमा। तिलोत्तमा को देखकर देवतागण भी सम्मोहित होने लगे। इस विषय में वर्णित है
जन्म के साथ मिला तिलोत्तमा को खास काम
जब तिलोत्तमा का जन्म हुआ था तो उन्हें दो असुर भाई सुंद और उपसुंद को अपने सौंदर्य से मोहि करके उनका अंत करने का कार्य दिया गया। तिलोत्तमा सौंपे गए कार्य को स्वीकार करते हुए दिव्य सभा की परिक्रमा करने लगी। जैसे-जैसे तिलोत्तमा दिव्य सभा की परिक्रमा करती गई उन्होंने अपने मनमोहक सौंदर्य से देवताओं, गंधर्व और ऋषियों सभी को मोहित और स्तब्ध कर दिया। उनके जब तिलोत्तमा भगवान शिव के प्रति सम्मान प्रकट करने क लिए उनकी परिक्रमा करने के लिए आगे बढ़ी। तब भगवान शिव अपनी लीला दिखाते हुए
माता पार्वती ने दिया तिलोत्तमा को शाप
भगवान शिव को पंचमुखी होने के साक्षी नारदजो ने जब पूरा वाक्या माता पार्वती से कहा तो वह बहुत क्रोधित हुई। माता पार्वती इतनी क्रोधित हुई की उन्होंने तुरंत ही अपनी हथेली से भगवान शिव की आंखो को ढक दिया। जैसे ही माता पार्वती ने भगवान शिव की आंखे ढकी तो पूरे ब्राह्माण्ड में अंधकार फैल गया। पूरी सृष्टि प्रलय, विनाश से हाहाकार करने लगी। देवी, देवता माता पार्वती से शिवजी की आंखों से हाथ हटाने की प्रार्थना करने लगे। लेकिन माता पार्वती किसी का आग्रह नहीं मानीं और और संसार जीव त्राहिमाम करने लगे। भगवान शिव ने तब अपनी परम लीला को प्रकट किया और शिवजी की तीसरी आंख खुल गई जिससे सृष्टि में प्रकाश फैल गया। इसके बाद देवतागण भगवान शिव की वंदना त्र्यंबक और त्रिनेत्रधारी के नाम से करने लगे।
अपने चार मुख प्रकट किए, कई कथाओं में कहा गया है कि शिव इस समय पंचमुख भी हो गए थे। लेकिन भगवान शिव की इस लीला से देवी पार्वती क्रोधित हो गई थीं

इसके बाद क्रोधित देवी पार्वती सामने खड़ी तिलोत्तमा को देखती हैं और तिलोत्तमा को कुरूप हो जाने का शाप दे देती हैं। माता पार्वती के शाप के कारण तिलोत्तमा कुरूप हो जाती है। तिलोत्तमा अपने शरीर को देखकर घबरा जाती है और माता पार्वती से दया करने का आग्रह करती हैं। तिलोत्तमा के हृदय विदारक वचन सुनकर देवी पार्वती को बहुत पछतावा हुआ।
माता पार्वती ने अप्सरा तिलोत्तमा को पृथ्वी पर माघ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को पवित्र स्नान के लिए हटकेश्वर तीर्थ स्थल पर ले जाती गईं। यहां अप्सरा तिलोत्तमा देवी पार्वती के शाप से मुक्त हो गईं और फिर से तिलोत्तमा को अपनी सुंदरता वापस मिल गई।अप्सरा तिलोत्तमा स्वयं को उस पुराने आकर्षक स्वरूप में पाकर अत्यंत संतुष्ट और प्रसन्न हुईं। उन्होंने देवी पार्वती को उनकी उदारता के लिए धन्यवाद दिया और पृथ्वी लोक से ब्रह्म लोक वापस जाने की अनुमति मांगी। इससे पहले देवी पार्वती ने अप्सरा तिलोत्तमा से कहा कि वह कोई वरदान मांगे उनकी कोई एक इच्छा को वह पूरी कर देंगी। इसपर अप्सरा तिलोत्तमा ने हाटकेश्वर के पवित्र स्थल में उन्हें समर्पित एक तीर्थ की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने आग्रह किया कि देवी पार्वती हर साल सभी स्त्रियों के कल्याण के लिए उस तीर्थ में पवित्र स्नान करना चाहिए, जिससे वहां स्नान करने वाली बाकी महिलाओं को भी सौंदर्य और वैवाहिक सुख प्राप्त


